Tuesday, March 1, 2016

बेरोजगारी के आलम में डिग्री की इज्जत बचना मुश्किल


बेरोजगारी के आलम में डिग्री की इज्जत बचना मुश्किल

डॉ.पुष्पेंद्र दुबे


इन दिनों यह दृश्य आम हो चला है जब अपनी शैक्षणिक योग्यता को दरकिनार कर युवा वर्ग सरकारी नौकरी के नाम पर किसी भी पद पर कार्य करने को तैयार हैं। एमटेक, एमबीए, इंजीनियर की उपाधि प्राप्त युवा, भृत्य और चपरासी बनने को तैयार हैं, तब यही लगता है कि हमारी शिक्षा का स्तर कितना गिर गया है। जिस युवा ने लाखों रुपये खर्च कर उच्च शिक्षा की उपाधि हासिल की है, वह स्वयं को डिग्री के अनुरूप कार्य करने के अयोग्य पाता है। बड़वानी और ग्वालियर में ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं, जहां स्वीपर और चपरासी पद के इंटरव्यू के लिए उच्च शिक्षित युवा मौजूद थे। यह इस देश की विडंबना ही कही जाएगी कि कौशल युक्त उच्च शिक्षित युवा देश में काम नहीं करना चाहता और कौशलरहित युवा को देश में उसकी योग्यता के अनुरूप रोजगार नहीं मिल रहा है। वैश्वीकरण के दौर में तकनीक ने एक तरफ तो नौकरियों में जबर्दस्त कटौती की है, वहीं दूसरी ओर महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों से प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में उच्च शिक्षित युवा वर्ग समाज में प्रवेश कर रहा है। ऐसे युवा वर्ग के पास कौशलरहित डिग्री है। महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में अध्यापन में संलग्न प्राध्यापक भी ऐसे किसी कौशल से अनजान हैं, जिससे अध्ययनरत युवाओं को अध्ययनकाल समाप्ति के बाद तत्काल रोजगार उपलब्ध कराया जा सके। अध्ययनकाल समाप्ति के बाद उसके पास केवल एक डिग्री होती है, जिसे लेकर वह नौकरी की आस में भटकता रहता है। भृत्य अथवा चपरासी अथवा सफाईकर्मी के पदों के लिए हजारों उच्च शिक्षित युवाओं द्वारा किए जा रहे आवदेन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। ऐसा लगने लगा है कि बेरोजगारी की परिभाषा बदलने के दिन आ गए हैं। सरकारों द्वारा पहली पंचवर्षीय योजना से ही रोजगार सृजन के लक्ष्य निर्धारित किए जाते रहे हैं, परंतु उसमें सरकारें हमेशा विफल रही हैं। नौकरी और डिग्री के संबंध ने हुनरमंद युवाओं को हमेशा ही दोयम दर्जे का सिद्ध किया है। एस्पायरिंग माइंड्स ने नेशनल एंप्लायबिलिटी रिपोर्ट में यह खुलासा किया है कि शिक्षण संस्थान लाखों युवाओं को डिग्री तो दे रहे हैं, लेकिन कंपनियों को लगता है कि इन युवाओं के पास काम के लिए जरूरी प्रतिभा और कौशल नहीं है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था और सरकार की नीतियों ने परंपरागत व्यवसाय करने वाले लोगों को अपने व्यवसाय से विमुख कर दिया है। आज युवाओं में पुश्तैनी व्यवसाय को आगे बढ़ाने में बिलकुल दिलचस्पी नहीं है। यह बात भी सही है कि वर्तमान आर्थिक व्यवस्था में उन्हें अपना पुश्तैनी व्यवसाय बचाना कठिन होता जा रहा है। ऐसे में उन्हें विकल्प के तौर पर सरकारी नौकरी नजर आ रही है। नौकरी और डिग्री का संबंध समाप्त कर देना चाहिए अन्यथा डिग्रियों को अपनी इज्जतबचाना कठिन हो जाएगा। जब तक उच्चतर माध्यमिक स्तर और उच्च शिक्षा स्तर पर कौशलयुक्त शिक्षण व्यवस्था को लागू नहीं किया जाएगा, तब तक स्टार्टअप अथवा स्किल इंडिया प्रोग्राम का देशव्यापी स्तर पर सफल हो पाना कठिन है।

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